और कभी सोच जब उलझ जाती है चलते हुए राह की किसी पगडण्डी के किसी कँटीले झाड़ से तब जब बढ़ जाती है शिला दर्द की अधूरेपन की चले जाने को जी चाहता है बस अधुरा वज़ूद सालता है जब कभी सन्नाटे गलियारों में तब खुद को मिटाने को जी चाहता है बस
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