20140731

ढलती शाम

सूरज छुप गया बादलों के टुकड़े में
शहर की छतों पसर गयी एक सावंली सी मंद रोशनी
दुख बीत जाता है
बीते नहीं तो मुश्किल होगा जीना
पूरा नहीं होता है सुख कभी
हो जाए तो आरजुएं अपना रोना रोने लगती हैं

No comments:

Post a Comment