20140416

येही बेहतर है

सूरज अभी डूबा है
उसकी उदास लाली
अब भी आस्मा पे बिखरी है

और चाँद
अभी से झांक रहा है

पंछी अपने बसेरों को लौट रहे हैं
और सारे लोग अपने घरो को

राह तकते देर हो गयी है
उम्मीद भी नहीं दिखती अब

ऑंखें धुंधला रही हैं
घर लौट चलूँ
येही बेहतर है अब