सूरज मेरे घर की ज़रा पुताई कर दो
आगे वाले कमरे को सुबह की लाली से
पीछे थोड़ा शाम का सिंदूरीपन कर दो
कोने वाले कमरे को यूँ ही रहने देना
उस कमरे में एक माँ है सिसकती हुई
लहूलुहान है सारा जिस्म जिसका
हर हिस्से में दर्द की लहर उठती है
वहाँ उजाला होगा तो दिख जाएंगे जख्म उसके
रात बुला कर मैं उससे ही रंगवा लूँगा
वैसे भी दिन रात वहाँ बारिश होती है
उस बारिश में रंग कहाँ से टिक पाएँगे