20170503

सूरज ज़रा

सूरज मेरे घर की ज़रा पुताई कर दो
आगे वाले कमरे को सुबह की लाली से
पीछे थोड़ा शाम का सिंदूरीपन कर दो
कोने वाले कमरे को यूँ ही रहने देना
उस कमरे में एक माँ है सिसकती हुई
लहूलुहान है सारा जिस्म जिसका
हर हिस्से में दर्द की लहर उठती है
वहाँ उजाला होगा तो दिख जाएंगे जख्म उसके
रात बुला कर मैं उससे ही रंगवा लूँगा

वैसे भी दिन रात वहाँ बारिश होती है
उस बारिश में रंग कहाँ से टिक पाएँगे

आस

संग अब भी हैँ बीती यादों के एहसास
हाथ मे जाम है फिर भी है दिल मे प्यास
है विचरता ले के नयनों में वो अश्क़
न जाने कैसे उसके ख्वाब हैं खास
आज भी सुनाई देती है उसको आवाज़ें
चाँद उसका पुकारता है उसको है आस