बोझ कितना भी हो
लेकिन कभी ऊफ तक नहीं करता
बड़ा मजबूत होता है
कन्धा बाप का साहिब
टूटता है तब
जब बिखरते हैं उसके सपने
बिलखता है अकेले में
जब कंधे चढ़े बच्चे बड़े होकर
चल देते हैं राह अपने
मगर खुश है होता
देख कर सुरभित सुमन अपने
उसको है मालूम
उसको है पता
आगे बढ़ना ही है जीवन
सो एक अँधेरी रात के अंधियारे में
करता है विदा उनको
नीर नयनों में भरे अपने
जा कर ले पुरे जो तेरी चाहत है
कांपते हाथों से आशीष देते
थरथराते लबों से फूटते हैं
अस्फुट से स्वर इतने
।। ईश् सदा सहाय।।