20131201

जी चाहता है

और कभी सोच जब उलझ जाती है
चलते हुए राह की किसी पगडण्डी के किसी कँटीले झाड़ से
तब
जब बढ़ जाती है शिला दर्द की
अधूरेपन की
चले जाने को जी चाहता है
बस
अधुरा वज़ूद सालता है
जब कभी सन्नाटे गलियारों में
तब
खुद को मिटाने को जी चाहता है
बस

बुद्दू ही रहना चाहता हूँ

बुद्दू ही रहना चाहता हूँ
नही होना चाहता समझदार
न ही समझना चाहता हूँ
दुनिया को
दूनियादारी को
कोई क्या करता है
क्यूँ करता है
सोचता क्या है
क्या समझता है
नही जानना चाहता
बस जानता हूँ
हर एक की सोच जुदा है
समझ भी जुदा है
पर
साथ है
रिश्ते हैं
उसने भेजा है
जीने की खातिर
बस
जीना चाहता हूँ
कोई चाह नहीं
कोई आस नहीं
बस