राहगीर को
धुप की आँच से जला रही थी जिंदगी
और उसका वजूद झुलस रहा था
वोह तलाश रहा था
इक साया
इक ठिकाना
जहाँ थोड़ी छाँव मिल सके
तनिक देर ही सही
थोड़ी राहत मिल सके
राह रेतीली थी
और पाँव बेदम हो रहे थे
ऐसा लगता था
जैसे
सांसें बस
अब थम ही जायेंगी
उसी वक्त
इक छोटी सी बदली उधर से निकली
किसी बड़े बादल से आयी थी
शायद
आसमां की सैर को निकली थी
थम गयी
और
उस राहगीर को छाँव मिल गयी
फिर हुआ यूँ
जैसा कि होता आया है
चाह इन्सान की कभी बुझती नहीं
कभी कम नहीं होती
राहगीर ने अपनी प्यास बुझाने की खातिर
अपने सूखे पपडीदार होंठ घुमाये
और बदली
वोह नन्ही बदली
सोचा ना जाने क्या उसने इक पल को
फिर
वो बरस पड़ी
रिमझिम बुँदे बन कर
तृप्त हो गया राहगीर
और आगे बढ़ चला
अपनी मंजिल की ओर
और बदली
वो तो खत्म हो गयी?
नहीं
वो फिर रूप बदल आसमां को पहुंची
किसी और राहगीर की प्यास बुझाने की खातिर
छाँव देने की खातिर