सुन री बावरी
खनखनाती है ज़िन्दगी
तुझे ही बुलाती है ज़िन्दगी
न जाने कबसे तुझको
आवाज़ लगाती है ज़िन्दगी
कभी बनके सुबह की धूप
कभी शाम की परछाई बन के
तेरे ही कानों में गुनगुनाती है ज़िंदगी
क्यों है उनींदी सी तेरी सब हवाएं
क्यों है संजीदा सी तेरे पास की फिजाएं
जब के तेरी ही खातिर मुस्कुराती है ज़िन्दगी
तुझे याद न हो के न हो,ये आसमां है तेरा
तूने किया जो खुद से इक वादा है तेरा
तुझे हर बार येही याद दिलाती है ज़िन्दगी
पता है उसको भी, चोटिल है मन तेरा
संजोए थे ख्वाब,टूटे,ज़ख़्मी है दिल तेरा
पर तू ही बता मुझे पगली
यूँ ठहर जाना, ऐसा कुछ सिखाती है जिंदगी!
Words are mine but its
Voice of your life,your aim