गैलेक्सी के उस छोर से
जहां सन्नाटा है
ना हवा है
ना रौशनी ही पहुँच पायी जहां आज तलक
उसी किनारे से
गैलेक्सी के
इक मध्धम सी
बारीक सी
आवाज़ की परछाईं
गैलेक्सी के अनगिनत उल्काओं
तारों से टकराती
बचती बचाती
किसी सुदूर अनजाने जगह
जहाँ से नयी भोर निकलती है रोजाना
वह जगह जिसके स्वप्न देखता है हर कोई
वोह जगह
जिसका साइंस को भी
ज्ञान नही अब तक
पहुँचना चाहती है
उसी जगह
ताकि ले आ सके
इक मुठ्ठी भर ही सही
रौशनी
गैलेक्सी का वो सुदूर कोना भी
रोशन हो सके