20161021

जीवन समर

कभी यूँ भी होता है
बँट जाता है मनुज दो हिस्सों में
इक अपराधी
इक न्यायाधीश
और उसका सत्य होता है मूक दर्शक
आसान नही होता
खुद को कटघरे में खड़ा करना
और खुद को सज़ा देना
पर करना तो होता है
अन्यथा मन में स्वयं के प्रति उपजी घृणा
बेकल रखती है
अपनी ही छाया कहती है पतित
तठस्थ होकर करना होता है निर्णय
खातिर जिसकी मन चाहिए स्फटिक जैसा
शुद्ध,पवित्र और संतुलित
अथवा जीना होता है अपराधबोध के साथ
निरंतर, अनवरत जीवन भर
यही है जीवन
झंझावतों से जूझना
बढ़ना और बढ़ते रहना
खुद की मलिनता के संग
जीवन समर
है जटिल ये डगर
होते नही आंसू भी रोने की खातिर
तप्त मरुभूमि जैसे तपता अंतःस्थल
मद्धम लय पर बजती साँसों की धौकनी
अनवरत चलता ये समर
नब्ज़ थमने तक
साँस रुकने तक
चलता जीवन समर