20151114

मुझे चाँद पर ले चलो

कल थामी ऊँगली बिटिया ने
और बोली
पा
मुझे चाँद पर ले चलो

कुछ अजीब थी ख्वाहिश
पर चेहरा उसका गंभीर था

क्या करेगी गुड़िया मेरी चाँद पर?
मेरा उस से ये सवाल था

उधर अजीब तरह से घूरने वाले अंकल न होंगे
आशीष के बहाने हाथ लगाने वाले बाबा न होंगे

आप भी तो डरते हो
रोज अख़बारों में पढ़ते हो
बाहर खेलने की खातिर नही भेजते हो

स्कूल जाने से लेकर मेरे लौटने तलक
बार बार सड़क निहारते हो

सुन उसका उत्तर
आँखों में उतर आया पानी
क्या कहता उस से
अब तो चाँद पर भी पहुच गया आदमी

जितना विस्तृत है गगन
इस गिद्ध के घात उतने ही गहरे हैं

कालिय से भी जहरीला है आज इंसान
खुद को कहता मानव
मानवता है हैरान

आज फिर जिद है बिटिया की
चलो पा
मुझे चाँद पर ले चलो

20150928

फिर से सफ़र....

फिर से सफ़र..
सफ़र गैलेक्सी के दूसरे कोने और उससे भी दूर अंतरिक्ष तलक...
देखें कहाँ तक ले जाती है उस अनदेखे अपने की तलाश मेरी...
जो पुकारती है मुझको इन अँधेरी रातों में अपनी बाहें फैलाये...
सारा दिन काट लेती है जो इन सितारों के संग आँख मिचौली खेल के...
रात होते ही तलाशने लगती है मुझको और सुबकती हुई आवाज़ देती है...
वो आवाज़ गरम शीशे सी कानों में जब गूंजती है...
एक और रात काली रात कहती है
चल मुसाफिर
मंज़िल दूर है
ये तो बस मृगतृष्णा है तेरी
मरुभूमि में जल नही
बस उसकी मरीचिका दिखती है
दूर है वो स्रोत झरने का
मंज़िल दूर है तेरी
मुसाफिर
सफ़र ही तेरी मंज़िल है

Main

Aur samjhna bhi kisko
Aur kiski baat samjhna
Meri
Jo bas khwaab mein jeeta hai
Ekk andekha chehra
Jo hai hi nhi
Ho bhi nhi sakti
Na jaane kaise
Kaun se khwaab dikhye tumko
Jo koshish karne lgi tum
Us chehre ki jaghaa lene ki
Sab chhal tha mera
Jisne girafft mein jakad liya tumko
Tum
Jisne bas paal rakha hai palkon mein
pita ki laadli hone ka sapna
Jise darr lgta hai usse
Jisse khoon ka rishta hai
Hum
Bas kuchh pal the
Jab kuchh dard saajha huye the
Beet chuke hain
Kahin bhi nhin hain
Bas ek dhaaga hai
Toot ta nhi
Baaten hain jo zehan se mit ti nhin

Kyun

Main aisa hi tha na
Hamesha se
Bol na
Aisa hi tha
Kyun hoon aisa
Kaise hua
Koi wazha koi kaaran to hoga na
Ya yoonhi bewazha
Kya hota gar yoon tere janmdaata tere papa dekhte
Kya kahte woh tujhse
Air kya hota tera jawaab
Bta na
Kabhi kaha tha tumne
Btayi thi ekk khwaahish
Beeja tune us paudhe ko?
Keh de k mitti nhi mili
Jismen woh panap sake
Phal phool sake
Hwa bhi thi us beej ko bda hone layk
Keh de k na khaad tha,na paani
Boti kis umeed par?
Kehde
Air khud hi soch k dekh
Vigat mein
Anginat baar aaye avsar
Par na beeja tune woh beej
Sapnon ko bhi sansaar bhi sach hote dekha hai
Air tera beej sapna nhi haqeeqat hai
Boya hota to aaj usmen phool bhi hote
Tere hi shabd the na
Ekk murjhaya sadak par kuchla paudha air ekk maali
Maali to wahin tha hamesha
Tere hi pass
Par beeja nhi tune beej
Kal kal kal pe rahi taalti
Main to khair fair sahi
Tera main koi nhi
Par Jo apna tha
Sapna tha
Kyun bone se katraati rhi
Duji aankhon k aansu
Apni plkon mein le k bahati rhi

20150628

.

Hai yeh kahani

Garden of haven mein
Raha karte the
Eve n adam

All where thi bikhri Khubsurati
Phool the har jagha
Har ek kadam

Ish ne di thi poori azaadi
Ghumaa karte the woh dono
Heavan ki saari vaadi

God ne bola tha
Jaahaan mann chaahe jaana
Jo ji chaahe tum woh karna

Bas is right side ki jhadiyon ki or mat jaana
Na hi unke falon ko chakhna

Lekin

Jaisa k hota hai
Jis baat ko karne ko kahe log mna
Mann kehta hai
Kyun??
Chaahe wahi kaam karna

(Its human nature)

To
Kuchh din to rahe
Mann ko maarte
Jaate aksar usi or
Khade ho k jhadiyon ko taakte

Aur ekk din

Adam ko rha nhi gya
Usne haath badhaya
Toda ekk phal ko
Aur kha liya

(Aage kya hua yeh to har koi hai jaanta
Adam ko ghyaan aaya)

Ish ko pta lagi yeh baat
Adam ne khaye
Nishiddh phal

Kuch pal socha
Ish ne
Aur
Chal diye adam ki or
Dusre hi pal

Adam ne suni
Ish k kadamon ki chaap
Khud ko chhupa liya

Ish ne pahuch k
Adam ko di aawaaz
Suni usne aawaaz ish ki
Par
Chhupa rha un jhadiyon k peechhe
Chupchaap

(Ish ne adam n eve ko heaven se nikal diya,ham sabhi usi k vanshaj hain)

Yeh to thi kahani
Nhi jaanta
Sach hai ya jhoothi baani

Par
Dekhta hoon aaj bhi
Mann pukarta hai
Par
Ham uski nhi sunte

Khud ko chhupate hain
Khud ki hi nahi suntey

Dhundhtey hain
Mandir,masjid

Khud k bheetar
Nhi dhoondhtey

Umar beet jaati hai
Khatam ho jaati hai
Aur
Ham

Sach se hain bhagte
Kehte hain
K
Sad hain
Dukhi hain

Sukh ko hain talaashtey

Par

Sukh ka ekk sota(fountain)
Hai apney hi bheetar
Yeh hi nhi jaantey

Maanii

सारे ही मानी गिर पडे हैं शब्दों के झाड़ से
कोंपलें निकलती नही हैं पहले की माफ़िक
बाँझ की कोख जैसी खाली है कलम मेरी
किसी ठूंठ के जैसी
वो सियाही ए एहसास सूख के पपड़ी बन गयी है
दाग मिटता ही नही
न ही सियाही घुलती है नयन नीर से
सारे दिन हैं जैसे खाली पेज़
ब़स......

Maani

मानी गिर पड़े हैं शब्दों के झाड़ से
बाँझ की कोख जैसी खाली है .... मेरी
सुन्न पड़ने लगी हैं नसें एहसास वाली
मुझ जैसे की लाश जिस्म में है मेरी
वो रूह जो भटकती थी तलाश में न जाने किसकी
किसी ब्लैक होल में दफ़न हो गयी है
बाकी है बस टिन टिन करती साँसें
उनको भी इक दिन थमना है हमेशा के वास्ते
मिट्टी को एक दिन मिलना ही है मिट्टी में

Bitia aur paa

इक थी बिटिया
एक था उसका पा
छोटी सी दुनिया थी उनकी
खुशियाँ थी चारो ओर
बीत रहे थे दिन हँसी-ख़ुशी

फिर एक दिन पा ने कहा बिटिया से
मेरी लाडो,मेरी बिटिया
जाना होगा मुझको तुमसे दूर
हूँ मैं बहुत मज़बूर

दूर देश को जाऊंगा
पैसा वहाँ कमाऊंगा
लौट के मैं अपनी शहजादी का
धूम से ब्याह रचाऊँगा

वो निकल गया अनजाने देश
विदा करने अपने पा को बिटिया संग आई

पा ने उसको गले लगाया
प्यार से चूमा,माथा सहलाया

और निकल पड़ा अपने सफ़र पर
मंजिल कहाँ न थी उसको ख़बर

उधर दो आँखें उसे दूर होते देख रही थी
दो मासूम आँखें
पा की शहजादी की नम आँखें

और धीरे धीरे पा की परछाईं खो गयी
दिखना बंद हो गयी
लौट चली वापस वो आशियाने की ओर

रोज़ वो आती उसी किनारे
जहाँ उसने अपने पा को विदा किया था
इंतज़ार करती

वक्त का पहिया चलता रहा
वो हर दिन आती
इंतजार करती
फिर बोझल पाँव घर की ओर मुड जाते
आँधी ने रोका कभी बारिश ने कदम थामे
पर उसे न रुकना था
न वो रुकी

नित आती उसी किनारे
और नज़र ढुन्ढ़ती
अपने पा को

बीतता रहा वक्त
बिटिया बढती रही
सयानी हुई

कोई आया जिंदगी में
और फिर इक नया रिश्ता जुड़ा
इक शहजादा आया
पर वो कमी बनी रही
आती रही वो किनारे पर

दिन बीते
परिवार बसा
थी बच्ची कभी
बच्चों की माँ बनी

खुशियाँ तमाम फिर से आयीं
खिली बगिया,कल्याण मुसकाई
बीती होली,गयी दिवाली
पर एक कोना था अब भी खाली

अब भी जाती नित उसी किनारे
संग होते उसके बच्चे प्यारे

वक्त को रुकना न था
सो वो चलता रहा
बिटिया बड़ी हुई
माँ बनी
और फिर दादी नानी बनी

दुनिया बदली लोग बदले
किनारे भी दूर होते गये
पर
उसका आना नही रुका

जीवन की सांझ आने लगी
जिस्म भी थकने लगा

किनारे सूख चले थे

उस दिन किनारे पे आके उसने कदम आगे बढाये
उसी तरफ जिस ओर  पा को जाते उसने देखा था

कदम चलते रहे
और नज़र तलाशती रही

फिर नथुनों में इक खुशबू आई
इक पहचानी सी खुशबू
उन बाँहों की खुशबू
जिनमें बचपन बीता था

नज़र ने ढुन्ढ़ ही ली
वो पा की चादर थी
जिसने कभी उसे ठण्ड का एहसास न होने दिया था

उसने वो चादर बांहों में भरी
और सो गयी

और
उसका पा सामने था
बाहें फैलाये

पा के संग हो ली

आखिर जिसे खोजती रही तमाम उम्र
जिन्दगी की शाम ने दोनों को मिला ही दिया

Lakshmanrekha

याद आती है सीता
लक्ष्मण ने रेखा खींची थी
जिसमें प्रवेश की अनुमति किसी को न थी
पर
सीता मुक्त थी
वह बस प्रतीक था
खतरा है बाहर
कोई लक्ष्मण नहीं हमारी खातिर
स्वयं खीचनी होती है रेखा हमें
जीवन मर्यादित रहे ताकि

Marichika

ये लम्बी फ़ेरहिस्त
दिखती है जो
सोशल नेटवर्क पर
एकाकी ही है फिर भी
हर एक
खुद अपनी लड़ाई लड़ता हुआ
किसी अनजाने बोझ से दबा

यूँ महसूस होता है जैसे
एक रेगिस्तान पसर गया है भीतर

यही खालीपन अंतर्मन का
वीराना

अजब है मन
कुछ कन्फ्यूज्ड सा
मरीचिका के पीछे भागता

मरिचिकाएं
जिनकी होने की संभावना ही नहीं
और जान कर भी
पाने की जिद

Rishtey

रिश्ते बोझ नही होते कभी भी
बस आनी चाहिए उन्हें निभाने की कला
हम बड़े थोपना क्यूँ चाहते हैं
अपनी हर इच्छा
चाहते क्यूँ हैं कि
वो वैसा ही करें
जैसा हम चाहते हैं
आखिर क्यूँ
सहज होकर नही रह सकते क्या
साथ साथ
यकीनन हमारी दुनिया का हिस्सा हैं वो
पर
उनकी भी एक दुनिया है
उनकी भी इच्छा है
सपने हैं

खोलो उन गाँठों को
जो बाँध रखी हैं
परत दर परत
उलझाओ मत
शीतल बयार बहने दो
रिश्तों में स्नेह की

Chhotaa bachchaa

इक छोटा बच्चा
जो खुश
बहुत खुश रहना चाहता है
जीवन के हर पल का आनंद उठाना चाहता है
उसका मन करता है
बारिशों में खूब भीगे
और बच्चों की तरहा
और भी कई चाहतें हैं
जो वो छुपा कर रखता है
मन ही में अपनों की ख़ुशी की प्रार्थना करता है
वो बच्चा

जब भी कोई अपना निकलता है घर से बाहिर
तकता है उन्हें आँखों से ओझल होने तक
उसके बाय का जब उत्तर नही मिलता
उदास हो जाता है
पास हों नन्हे फ़रिश्ते गर उसके
खिलखिला उठता है वो
उन्हीं के आस पास मंडराता रहता है

कुछ भी नही चाहिए उसे
न मँहगे गिफ्ट या कपड़े
बस चाहता है
अपनों का साथ
उनकी जिंदगी से कुछ लम्हे
अपनी खातिर

वो छोटा बच्चा
कहीं और नहीं
मेरे ही मन में छुपा है
जीता है मुझ में ही
चाहता है अपनों के साथ
जी भरकर हँसते हुए
जीवन बिताना

मेरी बच्ची ने इक दफा कहा भी था
पा,आप के मन में इक बच्चा छुपा है
आप जो दिखाते हो
आप हो नही

सच ही तो है
मैं भी महसूस करता हूँ इस सच को
और आज स्वीकार भी

मुझमे छुपा है इक बच्चा
मेरे अंतर्मन में
चाहता भी नहीं कि
वो बड़ा हो
मैं उसे बड़ा नही होने दूँगा

क्यूकि
वो मुझे सिखाता है
खुश रहना
उम्मीद की लौ बुझने नहीं देता कभी
जिंदा रखता है मुझे
गर खो गया वो
मैं भी खो जाऊंगा
इस आपाधापी में
जिंदगी की

कभी यूँ लगता है
हम सब में एक बच्चा है
छुपा हुआ
जो
वक्त की लू से हलकान हो
गुम जाता है

गुम न होने दें उसे

20150311

माँ

"माँ" का कोई विकल्प नहीं है

Lines by ranjana bhatia

जिन्दगी का सार सिर्फ इतना
कुछ खट्टी कुछ कडवी सी
यादों का जहन में डोलना
और फिर उन्ही यादों से
हर सांस की गिरह में उलझ कर
वजह सिर्फ जीने की ढूँढना !!

20150310

Chaadar

Chaadar jo buni thi mil k
Jarzar ho gyi hai
Alfazon k teeron se zakhmi dono k fafolon k nishaan saaf nazar aate hain

Ashqon ki garam boonden tar rakhti hain
Odhna mumkin nhi

Ghav jo pade the
Un se nikla mavaad
Khoon k chakkatye
Dhul nhi paate
Chaah k bhi

Koshish ki tumne
Bun ne ki phir se
Pr saare dhaage kmzor
Toot jaate hain

Chaadar badalne ka wqt aa gya hai

इक मक़ा

क मक़ा को घर बनाते हैं
रिश्ते
वक्त के साथ घर की दीवारों पे
कुछेक दरारें पड़ जाती हैं
पपड़ी पड़ने लगती है
दरारें बातों की
पपड़ी गलतफहमी की

रंग ओ रोगन कराते हैं
पर दरारें
क्या करें कमबख्त
दिखती ही हैं
और
वक्त के साथ अजनबी हो जाते हैं
घर मक़ा बन जाते हैं

रिश्ते फूल हैं

रिश्ते फूल हैं
कुम्हला जाते वक्त के साथ
और सूख जाते
झड के मिल जाते मिट्टी में
मिल जाये कोई जो
बन के गुलकंद मिठास भरते
पर
खुश्बू पहले वाली
और रंगत वापस नही आती

20150308

क्यूँ

निगाह नीची क्यूँ कर रखी है तूने
कोई गुनाह नही
तेरा औरत होना

फख्र कर खुद के औरत होने पे
यीशु न होते
गर मरियम न होती

आसमा

पाँव में बंधी जंजीर को खोल
पँख खोल
उड़ जा
आसमा तेरा पुकारता है तुझे

20150304

अधूरी

अधूरी ख्वाहिशों के बीजों से पनपे
रात की काली दलदली गलियों में
पलकें खोलते हैं ख्वाब
जमीं नही मिलती उन्हें हकीकत की
ना ही सह पाते हैं ताप सच का
और गल जाते हैं बारिशों में अश्कों के
उन्ही गलियों में सिसकते हुए

20150217

कारण

ये क्या मजाक है,और हैं कहाँ श्रीमान,कोई खेल है क्या?पूछा नही के आखिर वजह क्या है
डॉली के पिता का पारा हाई था

आप शांत हो जाये,मैंने पूछा था,पर उन लोगों को भी पता नही इसकी वजह,शायद वो लोग शाम को आयें
डॉली की माँ बोली

तुम फ़ोन मिलाओ उन्हें,मैं पूछता हूँ

पर वो तो सुबह ही काम के सिलसिले में बाहर निकल गया है,3 या4 दिन में लौटेगा

---------------------------------
बीती सर्दियों में डॉली की मँगनी रजत से हुई थी
रजत एक प्राइवेट फर्म में जॉब पे था और डॉली की पढाई का आखिरी साल
दोनों परिवारो ने इसी साल के आखिर में शादी का तय किया था

मँगनी के बाद दोनों में मुलाकातें हुई और जाहिर है बातें भी हुई
इन मुलाकातों का दोनों परिवारों को पता था
और सब चाहते थे कि दोनों एक दुसरे को जान लें

रजत डॉली को हर सैटरडे कॉलेज से पिक कर लेता
किसी रेस्टोरेंट में दोनों थोडा वक्त बिताते
अपनी बातें शेयर करते
वक्त गुजरता गया

पर इधर कुछ वक्त से डॉली को लगता था कि रजत उसे ईग्नोर कर रहा है
पूछने पर वो बात को टाल गया
बोल कर कि ऐसा कुछ नही,तुम बिना वजह ऐसा सोच रही हो

पर कोई बात तो थी रजत जिसकी वजह से कतरा रहा था डॉली से

वो वजह ढूँढ रही थी और ये खबर
रजत ने शादी से इंकार कर दिया है
--------------------
वो सोचों में डूबी थी तभी
माँ ने कन्धे पे हाथ रखते हुए कहा
खुद को सम्भालो गुडिया,जो नसीब में है वो हो के ही रहेगा

उसने मन की गहराइयों से भगवान को पुकारा
तभी डोरबेल बजी

दरवाजे पे उसकी बड़ी बहन थी
उसे देख डॉली की आन्ख भर आयी सुरभि ने उसे थामा और चुप कराने लगी
खबर को पर लग गये थे जैसे
बुआ भी आ गयी
मासी और चाची भी

मैं कहती थी ना,हमारे समय में भी शादियाँ होती थी,आजकल नया चलन है,ये शादी के पहले मिलना जुलना

चुप करें बुआ,सुरभि ने गुस्सा होते हुए कहा

----------------
शाम तक प्रसाद जी भी अपनी पत्नी के साथ आ गये
प्रसाद जी रजत के पिता थे

भाई साहब,जो हुआ सपने में भी नही सोचा था,डॉली मुझे अपनी बेटी जैसी अज़ीज़ है,हम भी बेटी वाले हैं,समझ सकते हैं,शर्मिदा हैं हम
उसे लौटने दें,दिल न छोटा करें

------------

डॉली को अब तक नही समझ आया था कि आखिर रजत के इतने बड़े फैसले की वजह क्या थी
उसकी रातों की नींदें खो गयी थी
सुरभि ने रजत को कॉल किया तो जवाब मिला
आ कर बताऊंगा

----------

आखिर 10 दिन बाद रजत की वापसी हुई
दुसरे दिन ही वो प्रसाद जी और माँ के साथ डॉली के घर में था
सभी को इंतजार था कि वो शादी टूटने की वजह क्या बताता है

डॉली को बुला लीजिये
इतना सुनते ही डॉली के पिता आपे से बाहर हो गये
प्रसाद जी भी ये सुन गुस्सा हो गये
रजत ने कहा
मेरा डॉली को बुलाने का बस एक मकसद था कि कल को डॉली ये न कह सके कि मैंने झूठ बोला है,जो भी बात है उसके सामने क्लियर हो जाये

डॉली की माँ उसे बुला लायी

हाँ जनाब,अब बताये शादी से इंकार की वज़ह
डॉली के पिता बोले

मैं जानता हूँ कि मेरे डॉली से शादी न करने क़े फैसले से सभी हैरान हैं,और गुस्सा भी
पर सच कहूँ,मैं खुद भी दुखी हूँ
डॉली मुझे पसंद है पर मैं इसके साथ जिंदगी गुजारने को नही सोच सकता
ये देखने में सुन्दर है मगर नेचर से नही

वो रुका

मैं अप सबसे माफ़ी चाहता हूँ क्यूंकि सभी को मेरी बात बुरी लगी
पर मेरी बात पूरी ज़रूर सुन लें
फिर फैसला लें कि मैं सही हूँ या नही
मैं क्या कोई भी लड़का डॉली जैसी लडकी को अपनी जिंदगी में शामिल नही करना चाहेगा

तुम्हें जो कहना है खुल के कहो
डॉली के पिता तमतमा उठे थे

पहली बात डॉली की शक करना
वो हर मुलाकात में मुझसे पूछती की कहाँ गये थे?किसके साथ थे?
हर वक्त अपनी पसंद और अपनी जात का रोना
दुसरे की कोई एहमियत नही
ये सारे रिश्ते से अलग हो के बस मेरे साथ रहना चाहती है
मैं समझ नही पाता कि जब मेरी पसंद नापसंद की एहमियत नही फिर ये कैसे अडजस्ट करेगी

सबसे अहम बात
इसने मुझसे अपने परिवार की एक एक बुराई बताई
हर एक में कमियाँ गिनाई,

अब आप फैसला करें कि
जो लडकी अपने माँ बाप की इज्ज़त न करे,उनका भरम न रख सके,उनकी मुहब्बत का एहसास न हो जिसमें,बस कमियां दिखाई देती हों,वो मेरे माँ बाप की इज्ज़त करेगी?मेरे घर की कमियों को वो समाज तक फैला देगी,

उम्मीद है आप सब को मेरी बात समझ आ गयी होगी

डॉली और उसके माँ बाप का सर झुका हुआ था

डॉली के पिता लडखडाते हुए उठे
बोले
जो लडकियाँ अपने घर को अपना घर नही समझती,माँ बाप परिवार की बुराई करती हैं,ज़िल्लतें ही मिलती हैं उन्हें और उनके माँ बाप को....



20150201

पिता

पिता अपनी बेटियों के जीवन को जबरदस्त तरीके से प्रभावित करता हैभले ही वह प्रभाव सकारात्मक हो या नकारात्मक
पिता के व्यवहार से बेटी सीखती है जीवन में आने वाले दुसरे लोगों को
उसी के व्यवहार से दुसरो को समझती है
शायद एक लड़की को दुनिया को समझने के लिए उसके पिता की जरूरत है,पिता उसकी दुनिया है,विशेष रूप से किशोरावस्था के दौरान,चंचल उतार चढ़ाव के समय उसे अपने पिता के स्थिर मार्गदर्शन और शांत उपस्थिति की जरूरत हुआ करती है,उसे एक संतुलित पिता की जरूरत है,जो सख्त है लेकिन जिसे प्यार और क्षमा भी आती है
जब कभी वो डगमग हो पिता साथ होना चाहिए संभालने की खातिर
आसमा में उड़ते हुए जब अचानक कोई बाज़ उसपर लपके पिता का होना उस वक्त लाज़मी होता है
छुटपन में पिता के हाथों का झुला उसकी पहली पसंद है,भले वो बड़ी हो जाती है लेकिन उसे पिता की उपस्थिति की जरूरत होती ही है
एक बेटी को अपने पिता के बिना शर्त प्यार की जरूरत होती है
अगर बेटी को पिता का प्यार,साथ मिले तो उसे अपने जीवन में किसी और प्यार की जरूरत नहीं होगी
पिता को बेटी को विश्वास दिलाना चाहिए कि वक्त पड़ने पर वो उसकी खातिर जान भी दे सकता है
पिता को अपने प्यार को प्रदर्शित करना चाहिये
एक पिता एक लड़की को खुद के बारे में कैसा लगता है समझने में एक बड़ी भूमिका निभाता है
पिता के प्रोत्साहन से बेटी के आत्मविश्वास की भावना विकसित करने में मदद मिलती है
पिता उसको पहचानता है और बेटी की आंतरिक गुणों पर टिप्पणी कर उसे एक स्वस्थ आत्म छवि देता है
एक पिता विभिन्न गतिविधियों में बेटी की भागीदारी को प्रोत्साहित करता है और थोड़ा नियंत्रण जो खत्म हो गया है सिर्फ उसके उपस्थिति से नियंत्रित करके आत्मसम्मान प्रदान करता है
इसके अलावा, वह अपने सम्मान और आत्म छवि के लिए निर्धारित कारक के रूप में उसके लिए एक पुरुष की इच्छा पर निर्भर होने की संभावना कम है
अपनी बेटियों को प्रोत्साहित करने वाला पिता उन्हें जीवन में एक बड़ा आदर्श होता है
प्रोत्साहन के बिना भी कई महिलायें निराशा की भावनाओं के साथ जीवन बिताती हैं
पिता ही उसे मजबूत और स्वतंत्र बनाता है
जो पिता गलती करते हैं और स्वीकार करते हैं गलती को,विशेष रूप से अपनी बेटियों अपने बच्चों के लिए वरदान है
एक पिता गलती स्वीकारता है कि वह कुछ नहीं जानता तो वो अपनी बेटी को सिखाता है कि बड़ा होना ही सब कुछ नही होता

20150122

','

.,'

,',

,'

क्यूँ

.,.

,.,

,,

,.

.,

....

...

.

..

Bagiya