20161021

जीवन समर

कभी यूँ भी होता है
बँट जाता है मनुज दो हिस्सों में
इक अपराधी
इक न्यायाधीश
और उसका सत्य होता है मूक दर्शक
आसान नही होता
खुद को कटघरे में खड़ा करना
और खुद को सज़ा देना
पर करना तो होता है
अन्यथा मन में स्वयं के प्रति उपजी घृणा
बेकल रखती है
अपनी ही छाया कहती है पतित
तठस्थ होकर करना होता है निर्णय
खातिर जिसकी मन चाहिए स्फटिक जैसा
शुद्ध,पवित्र और संतुलित
अथवा जीना होता है अपराधबोध के साथ
निरंतर, अनवरत जीवन भर
यही है जीवन
झंझावतों से जूझना
बढ़ना और बढ़ते रहना
खुद की मलिनता के संग
जीवन समर
है जटिल ये डगर
होते नही आंसू भी रोने की खातिर
तप्त मरुभूमि जैसे तपता अंतःस्थल
मद्धम लय पर बजती साँसों की धौकनी
अनवरत चलता ये समर
नब्ज़ थमने तक
साँस रुकने तक
चलता जीवन समर

20161004

सॉरी बिटिया

मेरी अच्छी बिटिया
प्यार और आशीर्वाद

कैसी हो तुम?
अच्छी ही होगी
मेरा मन पल पल तुम्हें आशीर्वाद देता रहता है पर अपने आशीष से ज्यादा तुम्हारी खिलखिलाती हंसी पर यकीन है कि तुम अच्छी ही होगी
पर बाप हूं ना कभी कभी तुम्हें सोचकर बहुत परेशान हो जाता हूं

तुम जानती हो ना बेटी कि तुम्हारे और मेरे विचार कभी नहीं मिले
तुम पूर्व तो मैं पश्चिम रहा हूं
कई बार तुम्हारी बातों ने मेरा दिल तोड़ा है और जाने कितनी बार मैंने तुम्हारा मन दुखाया है
हम अक्सर बदलते दौर के हर मुद्दे पर आमने सामने हुए हैं जाहिर है मैं ही जीता हर बार और अंत में तुम रूंधे कंठ से दूसरे कमरे में चली गई
तात्कालिक रूप से मेरा पुरुषत्व भले ही जीत गया हो पर मेरा मन जानता है कि मेरा पितृत्व हर बार हारा है

मुझे याद है जब तुम इस दुनिया में आने वाली थी तब कितनी नाजुक और नर्म अनुभूतियों के बीच मैं रोज डूबता-उतराता था
हर दिन सपने देखता था तुम्हारे
कैसी होगी तुम...
गुलाबी गुलाबी, सफेद सफेद या फिर मेरी तरह श्यामल-सांवली...
आंखें कैसी होगी हिरनी की तरह या चिडिया की तरह.. हंसी कैसी होगी दूध से धूली हुई सुंदर स्वच्छ या फिर शर्माती लजाती पतली सी रेखा..
तुम जोर से हंसोगी अट्टाहास या धीमे से मुस्कुराओगी स्मित हास...

आखिर वह दिन आया जब तुम मेरे हाथों में थीं और मेरे हाथ कांप रहे थे..
ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व कभी बच्चे गोद में न लिए हो पर तुम..
तुम तो उन सबसे अलग थी ना बिटिया..
मेरी बेटी..
मेरी अपनी बेटी..
मैं कितना कौतुक से भरा था कि ओह...
लाल गुलाबी हाथों की वह एकदम नन्ही सी पतली पतली अंगुलियां मैं कभी नहीं भूल सकता..
लगा जैसे किसी ने ताजे मक्खन की चिकनी सी टिकिया मुझे थमा दी हो...
तुम्हारे उस नर्म रेशमी एहसास को मैं आज भी कलेजे से लगाकर भावुक हो उठता हूं...

फिर तो हर दिन तुम मुझे नई नवेली लगती
याद है, तुम्हारे माथे पर काजल चांद टीका में ही लगाता था...
फिर नन्हीं मुट्ठियों को खोलकर उनमें काजल बिंदी लगाता फिर सुकोमल पैरों को हाथ में लेकर उन पर भी नजर का काला टीका लगाता

जैसे जैसे तुम बड़ी होती गई मेरे व्यवहार में अनचाहा परिवर्तन आता गया और इस व्यवहार से तुम मुझसे दूर होती गई
मेरी हर बात तुम्हें बुरी लगने लगी
मेरी टोका टोकी, मेरी दखलअंदाजी से तुम मुझसे नाराज होती गई
ना कभी मैंने तुम्हें समझने की कोशिश की ना तुमने कभी अपने पिता का दिल पढ़ना चाहा और दूरियां बढ़ती गई...

दोष तुम्हारा नहीं मेरा अधिक है
मैं हर वक्त आशंकित और आतंकित रहा ना जाने किस होनी अनहोनी के डर से और तुम पर दबाव डालता गया... मैंने जितना तुम पर नियंत्रण चाहा तुम उतनी ही स्वच्छंद होने के लिए छटपटाने लगी...
बात यहां तक आन पड़ी कि तुमने मुझसे बात करना बंद कर दिया

फिर एक दिन तुम्हारी शादी हो गई
मेरे पसंद के लड़के से
जिस दिन तुम इस घर से ब्याह कर बिदा हुई
मैं खाली हो गया और तुम आजाद...

उस दिन मैंने बैठकर खूब सोचा कि आखिर क्या मिला मुझे तुम पर लगाई अनावश्यक पाबंदियों का फल...
अब तुम मेरी कहां रही अब तुम अपने पति की हो गई हो... एक आजाद ख्याल वाले परिवार की बहू...
मैं जानता हूं तुम्हें मेरी पसंद पर कतई भरोसा नहीं था पर तुम चुपचाप शादी के लिए तैयार हो गई

जाते-जाते तुमने मुझसे कहा था
पापा, मैंने शादी के लिए इसलिए हां की क्योंकि मैं आपके साथ रहना नहीं चाहती थी

मेरा दिल फट गया था उस दिन... 

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि मैं अपना गुनाहगार खुद हूं या समाज से छनकर आती विकृत खबरों ने मुझे ऐसा बनाया पर यकीन मानो बेटी मैंने तुम्हारा सहज स्वाभाविक जीवन कभी नहीं छीनना चाहा आखिर बाप हूं तुम्हारा...
लेकिन अफसोस कि मैंने ऐसा ही किया जो मुझे नहीं करना चाहिए था

तुम खुश हो ना अपने पति के साथ..
यकीन मानो अब मैं भी वैसा नहीं रहा पर कभी कभी बहुत याद आती हो तुम कि मैं तुम्हें ना जाने किस डर से कभी प्यार नहीं कर पाया..
वैसा जैसा बचपन में किया करता था...
हो सके तो इस खत को पढ़कर घर आना मैं अच्छा पिता बनना चाहता हूं तुम्हारे लिए...
एक बार सच्चे दिल से सॉरी कहना चाहता हूं...
आओगी ना?

खूब सारा प्यार
तुम्हारा पापा

20160826

अस्फुट स्वर

बोझ कितना भी हो
लेकिन कभी ऊफ तक नहीं करता
बड़ा मजबूत होता है
कन्धा बाप का साहिब
टूटता है तब
जब बिखरते हैं उसके सपने
बिलखता है अकेले में
जब कंधे चढ़े बच्चे बड़े होकर
चल देते हैं राह अपने
मगर खुश है होता
देख कर सुरभित सुमन अपने
उसको है मालूम
उसको है पता
आगे बढ़ना ही है जीवन
सो एक अँधेरी रात के अंधियारे में
करता है विदा उनको
नीर नयनों में भरे अपने

जा कर ले पुरे जो तेरी चाहत है
कांपते हाथों से आशीष देते
थरथराते लबों से फूटते हैं
अस्फुट से स्वर इतने

।। ईश् सदा सहाय।।

20160802

सुन री बावरी

सुन री बावरी
खनखनाती है ज़िन्दगी
तुझे ही बुलाती है ज़िन्दगी
न जाने कबसे तुझको
आवाज़ लगाती है ज़िन्दगी
कभी बनके सुबह की धूप
कभी शाम की परछाई बन के
तेरे ही कानों में गुनगुनाती है ज़िंदगी
क्यों है उनींदी सी तेरी सब हवाएं
क्यों है संजीदा सी तेरे पास की फिजाएं
जब के तेरी ही खातिर मुस्कुराती है ज़िन्दगी
तुझे याद न हो के न हो,ये आसमां है तेरा
तूने किया जो खुद से इक वादा है तेरा
तुझे हर बार येही याद दिलाती है ज़िन्दगी
पता है उसको भी, चोटिल है मन तेरा
संजोए थे ख्वाब,टूटे,ज़ख़्मी है दिल तेरा
पर तू ही बता मुझे पगली
यूँ ठहर जाना, ऐसा कुछ सिखाती है जिंदगी!

Words are mine but its
Voice of your life,your aim

20160613

Benaami kavita

Sachche mann se dekhe huye swpan toot hi jaate hain
bikhar jaate hain hmesha hi yeh ret k mahal
Athak pryaason k baad bnta hai ek gharaunda
Aur ek lahar saagar ki sab kuchh mita deti hai
Waapas jaati huyi lahar avshesh bhi mita deti hai
chhor k awsaad,peeda,kuch pal aur aansu bahate chakshu

20160604

चेहरे

बेफिक्र चेहरे,फिक्रमन्द चेहरे
झुंझलाए चेहरे,मुस्कुराते चेहरे
चन्द चेहरे बेज़ार से,कुछेक बेमिसाल
कुछ है घबराये से,कुछ हैं मुतमुइन
थके हुए चेहरे भी हैं,तो हैं ताजादम भी
इक हुजूम लोगों का,आसपास हमेशा ही
तिलस्मी लोग,तिलस्मी चेहरे
सब ही साथ,पर कोई साथ नहीं

Ishq

Ishq ki barsaati mein dubke do log
ishq hai ya tapish
unjaani duniya ko jaan ne ki khwaahish

Naadani hai shaayad
ho hi jaati hai aksar
Zarooraten bhi na....

Jise log ishq kehte hain na
Meri alag hi theory hai
Naye jawaan hote jism au mann
Talaashte hain ek opposite pole khud se
Jaan ne ki khaatir,kuchh zarooraton ki khaatir
Dekha hai maine laal doron ko ankhon mein aate kisi ko dekh k
Honthon k shabdon ko sukhe halak se neeche utarte huye
Zaroorten bhi dekhin hain
Au dekhen hain milan bhi
Kuchh bhi nhi dikha mohabbat jaisa
Bas zarooraton ka wqti naam hai aaj ishq
Roj hi badlte dekhta hoon chehre isq k

Imaaraten

Imaarat
Dekhi to hogi bante huye
Aksar raahon se guzarte huye
Dikh hi jaati hain banti huyi imaarten
Gaara,mitti,cement, ret aur saryion ko
Inch inch judte huye,upar uthte huye
Aur kuchh bhi hota hai kya
In imaaraton mein
Innton ko ret cement k mixture se jod k banti hain na yeh imaarten
Mazbooti ki khaatir kahin sariye bhi hote hain istemaal
Phir in deewaaron k upar concrete aur sariye se banaate hain chhat
phir diwaaren au unpe chhat
Are haan
In deewaaron me hote hain darwaaze au khidkiyaan
Taaki aati jaati rahe hawaayen au log bhi

Inhi imaaraton mein jo hote hain na
Flats
2bk,3bk
Rehte hain log,au unhin darwaazon se aate jaate hain
Tamaam rishte bhi rehte hain inhi mein

Aur jab aata hai ek bhukamp
Dol jaati hai dharti
tab kuchh imaaraton ki deewaaron se kuchhek innten sarkne lagti hain,daraar aa jaati hai
au phir ek ek kar intten girti hain
Au Imaarat bn jaati hai khandhar
Saare rishtey tab namaalum kis or chale jaate hain
shayad nyi imaraton ki or chal dete honge unko gulzar krne ki khaatir...

Yoon bhi hota hai kabhi kabhi
Dhahti huyi imaaraton mein chand log reh jaate hain
Dafan ho jaate hain
Apney sapnon k saath

Aisi hi ek Imaarat thi,kuchhek ssal pehle
Kisi ne bnaayi thi,bahut hi lagan se,
Apnon ki khaatir
Sajaaye the anginat khwaabon k taare
Uski chhat au deewaaron pe
aalmariyon mein sajaye the
Lamhon k moti se bane showpieces
Khoobsurat se

Ek raat yoon hua jaise pairon k neeche jameen hilii
saari Imaarat dhah gyi
Aur woh usi mein dab gya
Chikhta
Koi bhi to na tha

Kabhi kabhi mera guzrna hota hai us jagha se
Malba aaj bhi bikhra hai
Innton k beech dikhta hai ek kshat viksht jism bawle ka

20160506

वो होते है पापा

ये दुनिया पैसों से चलती है
पर सिर्फ बच्चों की ख्वाईशें पूरी करने
पैसे कमाना चाहते है
वो होते हैं पापा

हम जब थक कर आराम फ़रमाते हैं
तब थक कर भी हमारे लिए पैसै कमाने जाते है
वो होते हैं पापा

हम तो सिर्फ अपनी खुशी में मस्त होते हैं
पर हमें खुश देख कर जो अपने ग़म भूल जाते हैं
वो होते हैं पापा

घर में सारे लोग अपना प्यार जताते है
पर कोई बिना दिखाए या जताए प्यार किए जाते हैं
वो होते हैं पापा

जब मम्मी की डाँट मिलती है
तो कोई चुपके से हँसा देते हैं
वो होते हैं पापा

जब बच्चे सो रहे होते हैं,तब कोई
चुपके से सिर पर हाथ फिराते हैं
वो होते हैं पापा

जो सपने बच्चे देखते हैं
उन्हें पूरा करने का रास्ता बताते हैं
वो होते हैं पापा

बेटी शब्द को सार्थक कर पाना मुश्किल है
पर कोई बिना स्वार्थ के अपने पिता शब्द को सार्थक बनाते हैं
वो होते हैं पापा

बिदाई के समय बेटीयाँ तो रोती हैं
पर अधिक आंसू कोई और बहाते हैं
वो होते हैं पापा

20160505

बिटिया के साथ कुछ पल

क्या खोया क्या पाया
क्यों करना इसका हिसाब
जो था अपना,अपना है
जो न था,मेरा था ही कब
बस कुछ लम्हे थे,बीत गए
राह तकने से न लौटेंगे अब

आओ,भटकते हैं
खंगालते हैं
कुछ बीते लम्हे
कुछ देखे सपने
कुछ किरचें अरमानों की
कुछ पन्ने आसमानों के

जीवन है क्या बिटिया तू ही बता
मेरी ऊँगली और तेरा हाथ
हाँ ,टूटे हैं कई अरमान,और बिखर गया सारा जहान
पर ओ री नन्ही शहज़ादी,
राहों में मोड़ तो मिलते ही हैं,
मोड़ों पे लोग बिछड़ते भी हैं
फिर आएंगे मोड़ परी,
जीवन बगिया फिर महकेगी

20160413

बंधू

घर
अकेलापन
जुडी हुई यादें
कुछ मसखरी
कुछ द्रवित पल
कुछेक अपने
चन्द सपने
एकाकी होकर भी
साथ होते हैं
कैसे हो अकेले
बंधु

उठो

मना है कुछ सोचना!!!
स्वप्निल आँखों में
स्वप्न संजोना!!!

उठो,
विगत को त्याग
नव विहान की करो तैयारी

यही है जीवन

यही है सार जीवन का

छूटता जाता है
बीता कल
और जुड़ते हैं
नव पृष्ठ

लेखनी इंतज़ार कर रही है तुम्हारा

तुम ही वरो

स्मृति के पटल पर
झिलमिल करते हुए
कुछेक पल
उनको जीते हुए
अश्रु या हास
निर्णय तुम्हारा

तुम ही वरो
स्वयं की खातिर
जीवन तुम्हारा
तुमको ही जीना है

विगत

कमरे की अलमारी
उस अलमारी का निचला खाना
तलाशो विगत के टूटे पेन
खंडित प्रतिमा
जो मित्र ने उपहार दी थी
कुछ डायरी के फटे हुए
पन्ने
धूलधूसरित

क्या रखा है ये???
क्यों रखा है???

विगत के वापस लौटने की प्रतीक्षा में हो!!!
रे पथिक,भोले मनुज
विगत वापस नही आता
कभी नही
व्यर्थ है संजोना उसे

मन की यात्रा (अधूरी)

कालरंग की कालिख से पुती हुई रात और यहां वहां बिखरे प्रकाश के अनंत बिंदु
मन भी काली रात की ही तरह लिपा पुता
विचार का कोई प्रकाश बिंदु किसी भी कोने में नहीं
ऑंखें देखती यंत्रवत सभी कुछ
और बीतते समय के साथ नियमित
जैसे सुनकर भी सुनाई नही देता कुछ
जैसे घाव की पहली कसक मन को हिला डाले
और सब सहज स्वभाव बन जाय

मन किसी यात्रा पर निकल पड़ा
वही गति,वही वेग,वही आवाज़ें
बहुत ही जानी पहचानी सी यात्रा
जानी पहचानी सी राहें
जाना पहचाना सा उन राहों का सन्नाटा
वही बिखरी हुई हवाएँ
जलते हुए अतीत के मंज़र
यही तो है जीवन
न कभी एकांत हटा
और न हटा वो वीभत्स सन्नाटा
पल पल होता रहा छलनी आत्म
शब्द बाणों से

समाज और परम्परा
जिनका न कोई ओर है न छोर
उनके बीच जलते हुए
कभी कभार मन होता है कि स्मृति दर्पण के सामने खड़े हो
गिने घावों को,कराहों को,कसकनों को
कोई हिस्सा तो हो जिससे लहू न रिसता हो
जिसका घाव भर गया हो

एक बच्चा,नवजात शिशु
जिसे अनमने ही असंख्य अनगिनत काँटों की झाड़ियों में फेंक दिया गया
जिस करवट मुड़े
हजारों कांटे सर से पांव तक समा जाएँ
सरकने की कोशिश में
काँटों के वो घाव लंबी लम्बी धाराओं जैसे पुरे शारीर पर खिंच जाएँ
उन काँटों में पड़ा वो टुकुर टुकुर देखे
गिर्द उच्च कुलीन अट्टालिकाओं को
नियति है उसकी

ममता का अदृश्य स्रोत
बहुत खोजा है उसे
हर पल,हर साँस
मुक्ति नही मिली खोज से
बार बार उसी सत्य से टकराया
और टकराहट से उठी अपनी ही सिसकियाँ सुनी
मानवों की इस भीड़ में अकेला
जैसे यंत्र चालित वस्तु कोई
सभी से मिलना जुलना सहयोग करना
जीवन होते हुए भी निर्जीव
बस उपस्थिति है उसकी

20160408

पुराने पथ पर एक बार फिर

मन किसी यात्रा पर निकल पड़ा
वही गति,वही वेग,वही आवाज़ें
बहुत ही जानी पहचानी सी यात्रा
जानी पहचानी सी राहें
जाना पहचाना सा उन राहों का सन्नाटा
वही बिखरी हुई हवाएँ
जलते हुए अतीत के मंज़र
यही तो है जीवन
न कभी एकांत हटा
और न हटा वो वीभत्स सन्नाटा
पल पल होता रहा छलनी आत्म
शब्द बाणों से

20160303

वो आदमी

वो आदमी
अपनी ज़िन्दगी से निराश नहीं
जो किनारे लगे कूड़े के ढेर में
तलाशता है कुछ
फिर सड़क पे चलते लोगों को निहारता
और फिर अपने काम पर टिक लेता है
खुद को
शायद यही सोचता है
कि
ये सब मेरी खातिर नहीं
या फिर कुछ और
अचानक दौड़ के पास के कचरे से कुछ उठाता है
यूँ
जैसे पा लिया हो उसने प्रसाद ईश का

वो कचरा बीनने वाला आदमी

20160228

बेटी तो बेटी होती है....

तेज धूप में पसीने की बूंदें उसके चेहरे पर चुचुआ आतीं,जिन्हें वह बार बार पोंछ लेता था
उसके कपड़े उसके शरीर के साथ चिपक गए थे सांय सांय करती सडक पर दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था
उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी
एकाएक सामने से उसे एक जीप आती दिखाई दी
वह पलक झपकते सड़क के बीचोबीच आ खड़ा हुआ
चींई करती हुई ब्रेक लगी
ड्राइवर उसे घुड़कता या चपत रसीद करता इससे पहले ही गाड़ी से उतरते पुलिस अफसर ने उसे रोक लिया
पुलिस अफसर ने हाथ जोड़े
नतग्रीव खड़े उस व्यक्ति के पास आकर संजीदगी से पूछा
क्या बात है बाबा?

वह मर्माहत सा रिरियाते हुए बोला
मेरी बेटी…मेरी बेटी को....

क्या हुआ है आपकी बेटी को?
पुलिस अफसर ने हौसला अफजाई की

दो गुंडे उसे इस ओर भगा ले गए हैं
उसने इशारे से उस सड़क की ओर उँगली उठा दी

पुलिस अफसर पलटा और आदेश दिया इंस्पेक्टर,तुम फौरन उनका पीछा करो
यह बुजुर्ग बहुत घबराए हुए हैं,मैं इनके पास रहूँगा

आधे घण्टे के बाद जीप लौटी
उसमें वह लड़की और दोनों गुंडे भी थे

लड़की को देखकर पुलिस अफसर भीतर तक काँप गया
फिर अधेड़ व्यक्ति की ओर उन्मुख होकर बिना कुछ जाहिर किए पूछा
क्या यही आपकी बेटी है?

इससे पहले कि अधेड़ व्यक्ति कुछ कहता, लड़की बिलखती हुई पापा…पापा कहते हुए पुलिस अफसर से लिपट गई

अधेड़ व्यक्ति सब कुछ समझ गया
वह निरपेक्ष भाव से कुछ देर पुलिस अफसर को देखता रहा
फिर वह जाने के लिए मुड़ा
पुलिस अफसर सचेत हुआ और आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा
आप रुकिए,मैं अभी इंस्पेक्टर को आपकी बेटी को ढँढ़ने के लिए भेजता हूँ

अधेड़ व्यक्ति ने पल भर पुलिस अफसर की आँखों में झाँका
फिर गहरे सुख की अनुभूति के तहत धीरे से कहा
वह तो मिल गई साहिब
बेटी तो बेटी होती है,वह मेरी हो या आपकी
कहकर उसने हाथ जोड़े और लड़की के सिर पर हाथ फेरते हुए पलटकर गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी पर हो लिया

पृथ्वीराज अरोरा लिखित कहानी